शुक्रवार के ख़ुत्बों का एकसमान रूप धार्मिक स्वतंत्रता और वैचारिक विविधता पर एक गंभीर हमला--मोहम्मद राशिद अहमद, संपादक संगम उर्दू
Patna
शुक्रवार के ख़ुत्बों का एकसमान रूप धार्मिक स्वतंत्रता और वैचारिक विविधता पर एक गंभीर हमला--मोहम्मद राशिद अहमद, संपादक संगम उर्दू
अनिल मिश्र/ पटना
जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की ओर से केंद्र शासित प्रदेश की सभी मस्जिदों में शुक्रवार के ख़ुत्बों को एकसमान बनाने और उनके विषयों को पहले से तय करने का प्रस्ताव न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह सीधे तौर पर धार्मिक मामलों में खुला हस्तक्षेप और लोकतांत्रिक मूल्यों की आत्मा के विपरीत है। इतिहास में पहली बार किसी क्षेत्र में मस्जिदों के मिंबर-ओ-मेहराब (मंच व वेदी) को एक ऐसे सरकारी या अर्ध-सरकारी ढांचे में ढालने की कोशिश की जा रही है, जहाँ धर्मप्रचारकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समय की माँग के अनुसार धार्मिक व सुधारात्मक मार्गदर्शन का गला घोंट दिया जाए।मस्जिदें केवल इबादत (पूजा) की जगहें नहीं हैं, बल्कि ये मुसलमानों के सामूहिक जीवन, नैतिक प्रशिक्षण और धार्मिक चेतना को जगाने का सबसे बड़ा केंद्र रही हैं। शुक्रवार का ख़ुत्बा एक जीवंत और गतिशील प्रक्रिया है, जिसमें ख़तीब (वक्ता) स्थानीय आबादी की समस्याओं, समय की चुनौतियों, नैतिक मूल्यों और सामाजिक जरूरतों के अनुसार बात करता है। यदि इन ख़ुत्बों के विषय पहले से तय कर दिए जाएँ और किसी समिति के माध्यम से उनकी स्वीकृति अनिवार्य कर दी जाए, तो मस्जिदों का मंच एक नौकरशाही (ब्यूरोक्रेटिक) प्लेटफॉर्म बनकर रह जाएगा, जो जनता की वास्तविक और हृदयस्पर्शी आवाज़ को दर्शाने में असमर्थ होगा। इस फैसले के दूरगामी और खतरनाक परिणाम होंगे। यह कदम मुसलमानों की धार्मिक और पंथिक (मसलाकी) पहचान की स्वायत्तता पर सीधा हमला है, जो कि भारतीय संविधान द्वारा दी गई धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी (अनुच्छेद 25) की आत्मा के खिलाफ है। इस्लामिक इतिहास और परंपरा हमेशा से विविधता और व्यापक दृष्टिकोण की पक्षधर रही है। हर क्षेत्र और हर मस्जिद की परिस्थितियाँ, आवश्यकताएँ और समस्याएँ भिन्न होती हैं। सभी ख़ुत्बों को एक ही सांचे में ढालने से वैचारिक ठहराव (जड़ता) पैदा होगा और धर्मप्रचारकों की रचनात्मक क्षमताएँ क्षीण हो जाएँगी।इस प्रकार के कदम जनता और प्रशासन के बीच दूरियों को और बढ़ाते हैं तथा अल्पसंख्यकों के दिलों में अपने धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर गहरी आशंकाओं को जन्म देते हैं। मिंबर-ए-रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की गरिमा और पवित्रता का तकाज़ा यह है कि इसे किसी भी राजनीतिक या प्रशासनिक बंधन से मुक्त रखा जाए। जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड को इस विवादास्पद और अदूरदर्शी प्रस्ताव को तुरंत वापस लेना चाहिए। सरकार और संबंधित संस्थानों को ऐसे कदमों से बचना चाहिए जो जनता की भावनाओं को आहत करें और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुँचाएँ। जम्मू-कश्मीर के लोग पहले ही गहरे राजनीतिक और सामाजिक संकटों से गुज़र रहे हैं, ऐसे में धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप का यह नया प्रयोग परिस्थितियों को और अधिक बिगाड़ने का कारण बन सकता है।
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By किशोर अनिल
सीनियर एडिटर
राजनीति और राज्य मामलों पर दो दशक का अनुभव।

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