सड़क पर हर मौत सिर्फ दुर्घटना नहीं, राज्य के दायित्व की परीक्षा है—अब सड़क सुरक्षा को सरकारी योजना नहीं, जीवन के संवैधानिक अधिकार का अभियान बनाना होगा-विजय शंकर नायक
Ranchi
सड़क पर हर मौत सिर्फ दुर्घटना नहीं, राज्य के दायित्व की परीक्षा है—अब सड़क सुरक्षा को सरकारी योजना नहीं, जीवन के संवैधानिक अधिकार का अभियान बनाना होगा-विजय शंकर नायक
प्रदेश प्रवक्ता, झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी
अनिल मिश्र/रांची
झारखंड प्रदेश के लौह नगरी जमशेदपुर में हुए हालिया सड़क हादसे के बाद मुझे भीतर तक झकझोर दिया। तस्वीर में क्षतिग्रस्त वाहन दिखाई देता है, लेकिन असली तस्वीर उससे कहीं बड़ी है—उस वाहन में किसी का बेटा, किसी की बेटी, किसी परिवार की उम्मीद सवार रही होगी। सड़क दुर्घटना के बाद अखबार में एक संख्या छपती है, लेकिन उस संख्या के पीछे एक पूरा परिवार जीवन भर के लिए बदल जाता आंकड़ों के अनुसार झारखंड में 2023 में 5,315 सड़क दुर्घटनाओं में 4,173 लोगों की मौत, जबकि 2024 में 5,196 दुर्घटनाओं में 4,114 लोगों की मौत हुई। 2024 में 3,266 लोग घायल भी हुए। NCRB के 2024 के आंकड़े भी झारखंड के लिए 5,196 सड़क दुर्घटनाओं और 4,114 मौतों की पुष्टि करते हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा पीड़ादायक वह आंकड़ा है जो मार्च 2025 में झारखंड विधानसभा में चर्चा के दौरान सामने आया। विधानसभा में 2000 से 2025 के बीच झारखंड में सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 82,200 लोगों की मौत का आंकड़ा उद्धृत किया गया था। यह आंकड़ा 2000-2025 की अवधि का है, इसलिए इसे 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य गठन के बाद की बिल्कुल सटीक अवधि का आधिकारिक ऑडिटेड योग कहना उचित नहीं होगा; फिर भी यह त्रासदी के पैमाने को समझने के लिए बेहद गंभीर संकेत है। भारत के मुकाबले झारखंड की तस्वीर क्या कहती है?
2024 में पूरे भारत में लगभग 4.88 लाख सड़क दुर्घटनाओं में 1.77 लाख लोगों की मौत हुई। झारखंड में 4,114 मौतें हुईं। संख्या के लिहाज से झारखंड 36 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 16वें स्थान पर था। लेकिन केवल कुल संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। झारखंड में 2024 में प्रति 100 दुर्घटनाओं पर लगभग 79 मौतें दर्ज हुईं, जो अत्यंत गंभीर दुर्घटना-गंभीरता को दर्शाती है। तुलना की तस्वीर और स्पष्ट होती है—2024 में उत्तर प्रदेश में 24,118, तमिलनाडु में 18,449, महाराष्ट्र में 15,715, मध्य प्रदेश में 14,791, कर्नाटक में 12,390, राजस्थान में 11,790 और बिहार में 9,347 सड़क दुर्घटना मौतें दर्ज हुईं। दूसरी ओर केरल में 3,880 मौतें दर्ज हुईं। इसलिए झारखंड की चुनौती केवल दुर्घटनाओं की संख्या नहीं, बल्कि एक दुर्घटना के बाद उसके जानलेवा परिणाम भी हैं। और यह समस्या नई नहीं है। सरकारी आंकड़ों में झारखंड में 2018 में 3,542, 2019 में 3,801, 2020 में 3,044, 2021 में 3,513 और 2022 में 3,898 सड़क दुर्घटना मौतें दर्ज हुई थीं। क्या सड़क दुर्घटना को केवल 'दुर्भाग्य' कहकर छोड़ देना चाहिए?
मेरा मानना है कि नहीं। हर दुर्घटना का कारण अलग हो सकता है—तेज गति, शराब पीकर वाहन चलाना, ओवरलोडिंग, गलत दिशा, खराब सड़क, अवैध पार्किंग, सड़क किनारे अतिक्रमण, वाहन की खराब फिटनेस, चालक की थकान, खराब रोशनी, ब्लैक स्पॉट, कमजोर ट्रैफिक प्रबंधन या दुर्घटना के बाद समय पर चिकित्सा सहायता न मिलना। इसलिए सड़क सुरक्षा केवल पुलिस का विषय नहीं है। यह परिवहन विभाग, पुलिस, पथ निर्माण विभाग, नगर निकाय, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन और नागरिक समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है। भारत सरकार स्वयं सड़क सुरक्षा की रणनीति को Education, Engineering, Enforcement और Emergency Care—चार 'E' के आधार पर देखती है। परिवहन विभाग को अपनी भूमिका नए सिरे से तय करनी होगी
परिवहन विभाग केवल ड्राइविंग लाइसेंस और वाहन पंजीकरण जारी करने वाला कार्यालय नहीं हो सकता। उसे सड़क सुरक्षा का मुख्य समन्वयक और जवाबदेही वाला विभाग बनना होगा। मेरे विचार से झारखंड में निम्न कदम तत्काल प्रभाव से लागू किए जाने चाहिए—
1. 'जीरो डेथ' रोड सेफ्टी मिशन
हर जिले के लिए वर्षवार लक्ष्य तय हो—कितनी दुर्घटनाएं, कितनी मौतें और कितने ब्लैक स्पॉट हैं। लक्ष्य केवल दुर्घटना घटाना नहीं, बल्कि शून्य मृत्यु की दिशा में लगातार कमी होना चाहिए।100 प्रतिशत दुर्घटना खत्म' करने का वादा व्यवहारिक रूप से कोई ईमानदार सरकार नहीं कर सकती, लेकिन हर मृत्यु को रोकने योग्य मानकर Zero Fatality/Vision Zero लक्ष्य बनाया जा सकता है।
2. लाइसेंस व्यवस्था को कठोर और वैज्ञानिक बनाया जाए
ड्राइविंग लाइसेंस केवल परीक्षा पास करने का कागज न हो। विशेष रूप से बस, ट्रक और व्यावसायिक वाहन चालकों के लिए—वैज्ञानिक ड्राइविंग टेस्ट,रात में ड्राइविंग का परीक्षण,हाईवे ड्राइविंग प्रशिक्षण,
नशे की स्थिति में वाहन चलाने पर कठोर कार्रवाई,
चालक की थकान और कार्य-घंटों की निगरानी
अनिवार्य की जाए।3. वाहन फिटनेस में कोई समझौता नहीं
फिटनेस प्रमाणपत्र केवल कागजी प्रक्रिया नहीं होना चाहिए। भारी वाहनों में ब्रेक, टायर, लाइट, स्टीयरिंग, रिफ्लेक्टर, स्पीड गवर्नर और अन्य सुरक्षा उपकरणों की वास्तविक जांच हो।4. ओवरलोडिंग और हाई-स्पीड पर तकनीक आधारित कार्रवाई
जहां संभव हो वहां—ANPR कैमरा + स्पीड कैमरा + CCTV + ई-चालान + वजन मशीन + वाहन ट्रैकिंग को एकीकृत किया जाए।
2025 में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सड़क सुरक्षा संबंधी कार्यवाही में वाहन लोकेशन ट्रैकिंग और स्पीड-लिमिटिंग जैसे तकनीकी उपायों पर भी निर्देश/विचार सामने आए हैं। 5. हर जिले में ब्लैक स्पॉट का वैज्ञानिक ऑडिट
जिस स्थान पर बार-बार दुर्घटना होती है, वहां केवल बोर्ड लगाकर काम खत्म नहीं होना चाहिए।ब्लैक स्पॉट की Road Safety Audit हो और उसके बाद—सड़क की ज्यामिति,
मोड़,डिवाइडर,प्रकाश व्यवस्था,साइनेज,स्पीड नियंत्रण,पैदल यात्री क्रॉसिंग,बस स्टॉप,अवैध पार्किंग को सुधारा जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने भी सड़क डिजाइन में सुधार, ब्लैक स्पॉट की पहचान और जिला सड़क सुरक्षा समितियों की भूमिका पर जोर दिया है।6. सड़क किनारे खड़े भारी वाहनों पर विशेष अभियान
समाचार-पत्र की कटिंग में राजधानी और आसपास की सड़कों पर हाईवे पर वाहनों के खड़े रहने की समस्या भी सामने आती है। यह केवल यातायात अवरोध नहीं, बल्कि गंभीर सुरक्षा खतरा है।रात में बिना पर्याप्त रिफ्लेक्टर के खड़े ट्रक, बस या अन्य भारी वाहन दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। इसके लिए निर्धारित पार्किंग/ले-बाय, रिफ्लेक्टिव मार्किंग और नियमित पेट्रोलिंग जरूरी है।7. दुर्घटना के बाद 'गोल्डन ऑवर' को जीवन-मिशन बनाया जाए
सड़क सुरक्षा का अर्थ दुर्घटना रोकना ही नहीं है। दुर्घटना हो जाने के बाद मृत्यु को रोकना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
हर प्रमुख हाईवे पर—
एम्बुलेंस की रणनीतिक तैनाती,
ट्रॉमा सेंटर,
प्रशिक्षित पैरामेडिक,
हेल्पलाइन,
निकटतम अस्पताल से डिजिटल समन्वय,
Good Samaritan व्यवस्था
को मजबूत किया जाना चाहिए।
8. जिला सड़क सुरक्षा समिति को कागज से जमीन पर लाया जाए
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में जिला सड़क सुरक्षा समिति में जिला प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य, PWD, NHAI, परिवहन विभाग और नागरिक समाज की भागीदारी का ढांचा दिया गया है। समिति का काम केवल बैठक करना नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं की समीक्षा और सुधारात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करना है।
₹166.92 करोड़ की योजनाएं यदि अटकी हैं तो यह भी गंभीर चिंता है
11 महीने से ₹166.92 करोड़ की सड़क सुरक्षा योजनाएं लंबित बताई गई हैं और परिवहन विभाग द्वारा इन्हें आगे बढ़ाने के लिए कई बार पत्राचार किए जाने की बात सामने आई है। यदि सड़क सुरक्षा के लिए स्वीकृत या प्रस्तावित धनराशि प्रक्रिया में अटकती है, तो उसका प्रभाव कागज पर नहीं बल्कि सड़क पर पड़ता है। ट्रैफिक सिग्नल, सेंसर, रोड डिवाइडर, ड्राइवर टेस्टिंग, प्रशिक्षण, प्रवर्तन और अन्य सुरक्षा उपायों पर खर्च होने वाला प्रत्येक रुपया वास्तव में किसी परिवार को उजड़ने से बचाने में निवेश है।इसलिए सड़क सुरक्षा बजट को सामान्य प्रशासनिक मद की तरह नहीं, जीवन-सुरक्षा बजट की तरह देखा जाना चाहिए।
यह सवाल संविधान से भी जुड़ा है
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी सुरक्षित, सुगम और मोटरेबल सड़क के अधिकार को जीवन के अधिकार के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण माना है। इसलिए सड़क सुरक्षा केवल यातायात नियमों का पालन कराने का विषय नहीं है। यह सवाल है कि क्या एक नागरिक अपने घर से निकलकर सुरक्षित अपने घर लौट सकता है? किसी गरीब मजदूर की मोटरसाइकिल हो, किसान की पिकअप हो, छात्र की साइकिल हो, महिला की स्कूटी हो, बस में सफर करता कर्मचारी हो या ट्रक चलाता चालक—सड़क पर जीवन का मूल्य समान है। सड़क किसी की जाति, धर्म, वर्ग, राजनीतिक पहचान या आर्थिक स्थिति नहीं पूछती। दुर्घटना सबको समान रूप से प्रभावित कर सकती है। इसलिए सड़क सुरक्षा भी सबके लिए समान होनी चाहिए।
अब 'दुर्घटना हुई' नहीं, 'दुर्घटना क्यों हुई' पूछा जाना चाहिए
मेरी अपील है कि झारखंड में प्रत्येक घातक दुर्घटना का Fatal Crash Audit कराया जाए।
हर मौत के बाद एक रिपोर्ट बने—
कहां हुई?
किस कारण हुई?
सड़क की क्या स्थिति थी?
वाहन की फिटनेस कैसी थी?
चालक की स्थिति क्या थी?
स्पीड कितनी थी?
क्या वहां पहले भी दुर्घटना हुई थी?
एम्बुलेंस कितनी देर में पहुंची?
क्या उस स्थान को पहले ब्लैक स्पॉट चिह्नित किया गया था?
और सबसे महत्वपूर्ण—अगली मौत रोकने के लिए क्या कार्रवाई हुई?
यदि इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाएं, तो दुर्घटना का आंकड़ा केवल सरकारी फाइल नहीं रहेगा, बल्कि सुधार का आधार बनेगा।
हर मृतक के परिवार से एक वादा होना चाहिए
मैं उन तमाम परिवारों के दर्द को महसूस करता हूं जिन्होंने सड़क दुर्घटनाओं में अपने प्रियजनों को खोया है। किसी मां की गोद खाली हुई है, किसी पिता का सहारा छिना है, किसी बच्चे के सिर से माता-पिता का साया उठा है।
इसलिए मेरी दृष्टि में सड़क सुरक्षा का अंतिम लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि आंकड़े कुछ प्रतिशत कम हो गए।
अंतिम लक्ष्य होना चाहिए—
**हर परिवार सुरक्षित हो।
हर सड़क सुरक्षित हो।
हर यात्री सुरक्षित घर लौटे।
और किसी परिवार को सड़क दुर्घटना के कारण शोक का कार्ड न छपवाना पड़े।**
झारखंड के राज्य निर्माण को अब 26 वर्ष होने जा रहे हैं। विकास केवल पुल, सड़क, भवन और निवेश की संख्या से नहीं मापा जा सकता। विकास की सबसे मानवीय कसौटी यह है कि उस विकास के रास्ते पर कितनी जिंदगियां सुरक्षित बचीं।
हमारे लिए सड़क केवल डामर और कंक्रीट की पट्टी नहीं है।
यह जीवन की राह है।
और इस राह पर हर नागरिक को सुरक्षित चलने का अधिकार है।
सड़क सुरक्षा पर अब कोई ढिलाई नहीं—लक्ष्य होना चाहिए 'शून्य मृत्यु की दिशा में झारखंड'।
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लेखक के बारे में
By किशोर अनिल
सीनियर एडिटर
राजनीति और राज्य मामलों पर दो दशक का अनुभव।

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